Tuesday, June 25, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

लेकिन अगर वो सिर्फ़ एक मैच जीतती है और बाक़ी हार जाती है, तो स्थिति थोड़ी विकट हो सकती है.
फिर भारत को दूसरी टीमों के प्रदर्शन पर निर्भर करना पड़ सकता है.
उस स्थिति में इंग्लैंड अपने तीन मैचों में से सिर्फ़ एक मैच जीते और श्रीलंका अपना दो मैच जीत जाए, तो भारत एक मैच जीतकर भी सेमी फ़ाइनल में जगह बना सकता है.
ऑस्ट्रेलिया ने मंगलवार को इंग्लैंड को हरा दिया और सात में छह मैच जीतकर उसके सबसे ज़्यादा 12 अंक हो गए हैं.
अब उसे न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ़्रीका से मुक़ाबला करना है. अगर वो दोनों मैच हार भी जाती है तब भी उसका सेमीफाइनल में पहुंचना तय है.
मेज़बान इंग्लैंड के छह मैचों में आठ अंक हैं. मंगलवार को वह ऑस्ट्रेलिया से हार गई. अब उसे भारत और न्यूज़ीलैंड से मुक़ाबला करना है.
अगर इंग्लैंड ये दोनों मैच भी हार जाती है तो वो सेमीफ़ाइनल की रेस से बाहर हो सकती है.
बांग्लादेश के अभी सात अंक हैं और उसे भारत और पाकिस्तान से खेलना है.
अगर बांग्लादेश दोनों मैच जीत जाता है, तो उसके 11 अंक हो जाएँगे और वो सेमी फ़ाइनल में पहुँच सकती है, अगर श्रीलंका अपने सभी मैच हार जाए और इंग्लैंड एक से ज़्यादा मैच न जीते.
श्रीलंका के छह मैचों में छह अंक हैं. अभी उसे दक्षिण अफ़्रीका, वेस्ट इंडीज़ और भारत के ख़िलाफ़ खेलना है. ये मैच आसान नहीं होंगे.
अगर श्रीलंका की टीम तीनों मैच जीत जाती है, तो उसके 12 अंक हो जाएँगे.
अगर उसके सिर्फ़ 10 अंक हुए, तो उसे इंग्लैंड, बांग्लादेश और पाकिस्तान के मैचों के नतीजों का इंतज़ार करना होगा.
इस विश्व कप में पाकिस्तान की उम्मीद अभी ख़त्म नहीं हुई है. उसके पास पाँच अंक है और उसे तीन मैच और खेलने हैं.
उन्हें अब न्यूज़ीलैंड, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान से खेलना बाक़ी है.
अगर पाकिस्तान की टीम सभी मैच जीत जाती है, तो उसके 11 अंक हो जाएँगे.
लेकिन साथ ही उसे ये भी उम्मीद रहेगी कि इंग्लैंड एक मैच से ज़्यादा न जीते.
साथ ही बांग्लादेश और श्रीलंका भी कम के कम एक-एक मैच ज़
ये शख़्स वीडियो में पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ भी अपशब्दों का प्रयोग करते दिखाई पड़ता है.
वीडियो में जावेद कहते हैं कि जैश-ए-मोहम्मद के एक ऑपरेटिव ने उनके स्कूल जाकर एक भाषण दिया था जिसमें ये बताया गया था कि भारत प्रशासित कश्मीर में मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है.
वीडियो में जावेद कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने और उनके कुछ अन्य सहपाठियों ने जिहाद करने का फ़ैसला किया.
जावेद के मुताबिक इस घटना के वक्त वह महज़ 13 साल के थे और उन्हें उनके घर वालों की मर्जी के बगैर बालाकोट ले जाया गया था जहां उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों को ट्रेनिंग पर नज़र रखते हुए देखा.
जावेद ये भी दावा करते हैं पाकिस्तानी सैनिकों को देखकर उन्हें एहसास हुआ कि ये कैंप सेना चला रही थी और ट्रेनिंग के बाद चरमपंथियों को सीमापार भी भेजा जाता था.
राना जावेद नाम के फेसबुक अकाउंट पर प्रकाशित इस वीडियो में जावेद कहते हैं कि ये (वीडियो) उनकी अंतिम पोस्ट है और इसके बाद उन्होंने आत्महत्या करने का फ़ैसला किया है.
झंडेवालान पुलिस स्टेशन के एसएचओ आसिफ़ ख़ान ने बीबीसी को बताया, "ये शख़्स कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे थे और इन्होंने आत्महत्या नहीं की है. इस बात के साक्ष्य मौजूद नहीं है कि इस व्यक्ति ने आत्महत्या की है."
आसिफ़ ख़ान मानते हैं कि जावेद भाग गए हैं और वह अपने वीडियो की मदद से पुलिस को भ्रम में डालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वह गिरफ़्तारी से बच सकें.
ख़ान बताते हैं कि महिला पुलिसकर्मियों की मदद से जावेद के घर पर छापा भी मारा गया लेकिन जावेद उनके हाथ नहीं आए.
वीडियो में क्या कह रहे हैं जावेद?
राना जावेद अपने वीडियो में कहते हैं कि वह पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पीएमएल-एन के समर्थक हैं.
इसके साथ ही वह कहते हैं कि वह लोकतं
जावेद अपने वीडियो में दावा करते हैं कि पुलिस ने बिना किसी वॉरंट के उनके घर पर छापा मारा जिसमें उन्हें पकड़ने में नाकाम रहने पर उनके छोटे भाई को गिरफ़्तार किया जोकि आर्मी मेडिकल कॉर्प्स में काम करते हैं.
वीडियो में वह दावा करते हैं कि वह भी पाकिस्तानी सेना में पांच साल तक काम कर चुके हैं और अपनी मर्जी से उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया क्योंकि वह अपने घरवालों से दूर नहीं रह सकते थे.
वह दावा करते हैं कि उनका विरोध सेना से नहीं है लेकिन वह कुछ चुनिंदा जनरलों के ख़िलाफ़ हैं जिन्होंने पाकिस्तान के राजनीतिक तंत्र को जकड़कर रखा हुआ है.
वह ये भी कहते हैं कि वह नफ़रत और हिंसा फैलाने के लिए धर्म के दुरुपयोग के पक्ष में भी नहीं हैं.
वह अपने ख़िलाफ़ लगे ईशनिंदा के आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं कि उनके फेसबुक अकाउंट पर प्रकाशित पोस्ट्स को देखकर लोग ये फ़ैसला कर सकते हैं कि उनमें कुछ ग़लत था या नहीं.
वह कहते हैं कि उन्होंने किसी तरह की ईशनिंदा नहीं की है लेकिन उन्होंने धर्म पर कुछ सवाल ज़रूर उठाए हैं.
वीडियो के अंतिम हिस्से में जावेद अपने परिवार से माफ़ी मांगकर हुए रोते दिखाई देते हैं.
वह कहते हैं कि वह अपने प्रति नफ़रत का सामना करने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं.
जावेद के इस वीडियो को चार सौ बार शेयर किया जा चुका है और पचास हज़ार बार देखा जा चुका है.
वीडियो के कमेंट बॉक्स में लोग उनसे आत्महत्या न करने के लिए कहते हुए दिख रहे हैं.
वहीं कुछ लोग सेना और धर्म के बारे में कही गई बातों को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं.
पुलिस के मुताबिक़, जावेद फरार हैं और उन्होंने अपना फ़ोन बंद कर लिया है, इसलिए वह पहुंच से बाहर हैं. हालांकि पुलिस अब भी उन्हें तलाश रही है.
पुलिस ने फेसबुक पर ईशनिंदा करने और सेना के ख़िलाफ़ बोलने की वजह से जावेद के ख़िलाफ़ टेलिग्राफ़ एक्ट और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाए गए कानून के तहत एफ़आईआर दर्ज की है.
त्र, धर्म निरपेक्षता और विज्ञान में भरोसा रखने वाले शख़्स हैं.
रूर हार जाएँ.
पाकिस्तान के भक्कर ज़िले के झंडावालान क्षेत्र में स्थानीय पुलिस ने एक शख़्स के ख़िलाफ़ फेसबुक पर ईशनिंदा और सेना का विरोध करने के मामले में एफ़आईआर दर्ज की है.
राना जावेद नाम के इस शख़्स ने एक वीडियो बनाया था. इस वीडियो में ये शख़्स दावा करता है कि उसे प्रतिबंधित संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ख़ैबर पख्तूनवा के बालाकोट क्षेत्र में ट्रेनिंग दी है.
ये बालाकोट वही जगह है जहां भारतीय वायुसेना ने कुछ महीनों पहले हवाई हमला किया था.
भारत सरकार ने अपने आधिकारिक बयान में कहा था कि इस हवाई हमले में उसने अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया है.
भारत सरकार दावा करती है कि हवाई हमले में जैश-ए-मोहम्मद संगठन के कई लड़ाकों की मौत हुई थी और जैश का एक ट्रेनिंग कैंप भी ध्वस्त कर दिया गया था.
हालांकि, पाकिस्तान सरकार का दावा है कि 26 फरवरी को हुए भारतीय सेना का हवाई हमला एक निर्जन क्षेत्र में किया गया था और इसमें किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ था.

Monday, May 27, 2019

تجلس "نيتاما" أمام عدسات التصوير، وعلى رأسها قبعة ناظرة

بدأت هذه القصة في أواخر التسعينيات من القرن الماضي، بقطة أخرى حملت اسم "تاما"، كانت تعيش قرب محطة كيسي؛ المحطة النهائية لخط السكك الحديدية المؤلف من 14 محطة، والذي يمتد على طول 14.3 كيلومتراً، ويربط تجمعات سكانية صغيرة بمدينة واكاياما، وهي المدينة الرئيسية في هذه المحافظة. وفي تلك الآونة، كانت تلك القطة تتسكع غالبا بجوار مسار القطار، ما أكسبها محبة الركاب وتعلقهم بها.
وبمرور السنوات، اكتسبت "تاما" شعبية بين مستخدمي هذا الخط بفضل طبيعتها اللطيفة وملامحها التي تجعلها شديدة الجاذبية في الصور. وشرع المعجبون بها إلى تلقيبها بـ "ناظر محطة" كيسي. لكن بحلول منتصف العقد الأول من القرن الحالي، هدد مزيج من الأمور المرتبطة بانخفاض عدد الركاب من جهة والمشكلات المالية من جهة أخرى، بإلغاء خط السكك الحديدية الريفي هذا، وأصبحت محطاته الـ 14 في عام 2006 بدون موظفين.
لكن لحسن الحظ، لم تنته عندئذ حكاية هذا الخط أو قصة دور الهرة المحبوبة فيها. ويقول مسؤولو الشركة المالكة لشبكة واكاياما للقطارات الكهربائية إن السكان طلبوا في عام 2006 من المسؤول الحالي عن الشبكة، إحياء خط "كيسيغاوا" الذي كان المالكون السابقون للشركة قالوا إنه في سبيله للإلغاء.
وأشار مسؤولو الشركة إلى أن ذلك الطلب تزامن مع اتخاذ صاحب متجر يقع بالقرب من محطة كيسي - ويتولى في الوقت نفسه رعاية "تاما" - قرارا بالرحيل من المدينة. وقبل أن يغادرها طلب من مسؤولي السكك الحديدية الاعتناء بالقطة.
ورغم أن مدير شبكة "واكاياما" كان من المغرمين بالكلاب، فقد وقع في حب "تاما" بمجرد أن رآها، حسبما قال لنا مسؤولو شبكته، الذين أطلعونا على صور له وهو يحتضن بسعادة "الهرة ناظرة المحطة".
ولم يمر وقت طويل، حتى أمر هذا الرجل بحياكة إحدى القبعات المخصصة لنظار المحطات، على نحو خاص لتلائم رأس "تاما"، التي أعلنها رسميا في عام 2007، ناظرة لمحطة كيسي، لتصبح أول قطة تشغل هذا المنصب في اليابان.
وكان من بين واجباتها كناظرة للمحطة، أن تصبح واجهة لشبكة السكك الحديدية كلها، وأن تظهر في المواد الدعائية الخاصة بها، والتغطيات الإعلامية التي تتناولها.
كما كانت تلك الهرة تلعب دورا فعالا في إدارة شؤون المحطة، فقد كانت تُحيي المسافرين أحيانا من فوق طاولة نُصبت لها بجانب بوابات التذاكر، ومن وراء النافذة الزجاجية لـ "مكتبها"، وهو عبارة عن كشك تذاكر تم تصميمه خصيصا لها، وجُهِزَ بفراش صغير ووعاء للفضلات.
وفي تلك الفترة، حظيت "تاما" بحب وإعجاب الركاب وموظفي المحطة على حد سواء، إلى درجة إصدار أمر برسم لوحة لها من نوع "البورتريه"، وهي اللوحة الموجودة الآن في متجر المقتنيات التذكارية بمحطة كيسي، الذي يضم الكثير من المنتجات المرتبطة بها.
وبدلا من الراتب، حصلت الهرة على كل الطعام الذي تحتاجه. وفي عام 2008 رُقيت لتصبح "ناظرة محطة من الدرجة الممتازة" بل وحصلت على لقب "فارس" من جانب محافظ المنطقة.
ولم يعد غريبا أن يبدأ الآلاف من السائحين آنذاك في التدفق على المحطة الصغيرة، التي لا يوجد فيها سوى رصيف واحد، لرؤية هذه الهرة.
المفاجأة أن دراسة أُجريت عام 2008، كشفت عن أن وجود "تاما" في المحطة زاد عدد ركاب خط "كيسيغاوا" خلال 2007 بواقع نحو 55 ألف راكب إضافي عما كان يُتوقع في الأصل.
وخلال السنوات الثماني التي تولت فيها منصبها ناظرةً لمحطة "كيسي" بين عامي 2007 و2015، أسهمت الهرة في ضخ نحو 1.1 مليار ين (قرابة 9.97 مليون دولار) في شرايين الاقتصاد المحلي. وقالت الشركة المالكة لخط "كيسيغاوا" إن العدد السنوي لركاب هذا الخط زاد اعتباراً من عام 2006، بنحو 300 ألف راكب، بمساعدة هذه القطة.
وللاستفادة من الولع الذي اجتاح المنطقة بـ "تاما"، تعاقدت شبكة "واكاياما" في عام 2010 مع المصمم الياباني المرموق إيزي ميتوكا، الذي يُعرف بتصميماته الأنيقة للقطارات المعروفة باسم "الرصاصة" في اليابان، لكي يعيد تصميم بعض القطارات التابعة للشبكة من الداخل والخارج، بعدما تقرر تسمية خط كامل للسكك الحديدية على اسم الهرة، ليُولد خط "تامادين".
وتضمنت هذه التصميمات رسوما على العربات من الخارج لـ "تاما" وشواربها وآثار أقدامها ومخالبها. وبداخل القطارات، وُضِعَت أرضيات خشبية عتيقة الطراز، ورفوف لكتب أطفال. وكلمسة ختامية لهذه التصميمات المتفردة، يسمع الركاب مع فتح أبواب القطار في كل محطة صوت مواء، مأخوذ من تسجيلات صوتية لمواء "تاما".
وعندما فارقت تلك القطة الحياة في عام 2015، كانت تبلغ من العمر 16 عاما، ظهرت خلالها في برامج تليفزيونية ومجلات وصحف مرموقة في مختلف أنحاء اليابان. وحضر الآلاف الجنازة التي أُقيمت في المحطة، وتركوا وراءهم خارج أبوابها تلالا من باقات الزهور وعلب التونة.
وأُقيم لـ "تاما" التي بات يُطلق عليها منذ ذلك الحين لقب "الناظرة الشرفية للمحطة إلى الأبد"، مزار بحجم صندوق الهاتف على رصيف المحطة. فضلاً عن ذلك، رُفِعَت إلى مرتبة "رب" بشبكة واكاياما للقطارات، وذلك وفقا لتقاليد ديانة الشنتو السائدة في اليابان.
وفي عام 2017، وتحديدا في اليوم الذي كان سيصبح عيد ميلادها الثامن عشر، كرّم موقع "غوغل" القطة "تاما" بوضع رسم تذكاري لها على الصفحة الخاصة بمحرك البحث التابع له. الأكثر من ذلك، أن حساب تويتر الخاص بها ما يزال يجتذب، بعد أربع سنوات من مفارقتها الحياة، أكثر من 80 ألف متابع، والعدد في ازدياد.
بالإضافة إلى ذلك، أصبح خط "تامادين" ذا شعبية كبيرة بين الناس من مختلف الأعمار، حسبما يؤكد مسؤولو الشركة المالكة لشبكة "واكاياما". ويضيف هؤلاء أنهم بينما يرون "الكثير من الأطفال والعائلات، والمسنين ممن يجلبون أحفادهم معهم" وهم يستخدمون هذا الخط، فإن الأمر لا يقف عند هذا الحد، بل يشمل كذلك أشخاصا متحابين، والكثير من الأجانب ممن يأتون لركوب القطارات، ورؤية "ناظرات" المحطات من القطط.
ففي الوقت الحاضر، تشغل قطة أخرى - دُرِبَت على يد "تاما" على ما يبدو - منصب ناظرة محطة كيسي. وتحمل هذه الهرة البالغة من العمر ثماني سنوات اسم "نيتاما" (أو تاما الثانية). أما "يونتاما" (تاما الرابعة) فتعمل مساعدة لها في محطة إيداكيسو، على بعد خمس محطات. وتعمل القطتان من الساعة العاشرة صباحا وحتى الرابعة عصرا خمسة أيام في الأسبوع. أما "تاما الثالثة" فهي موظفة في شركة لخطوط الترام، و"تعمل" مديرا بالنيابة لأحد المتاحف.
ورغم أن "تاما" والقطط الأخرى التي شغلت مواقع قيادية في شبكة السكك الحديدية في واكاياما، قد لعبت جميعا دورا رئيسيا في إحياء خط "كيسيغاوا"؛ فإن مسؤولي الشركة المالكة للخط يحرصون على تأكيد أن هذا الإنجاز لا يُعزى فقط للهررة. ويشير هؤلاء إلى أن الشركة تعاقدت مع المصمم ميتوكا لتصميم وابتكار الكثير من القطارات الأخرى، التي يُعبر كل منها عن موضوع ما بعينه، وذلك للمساعدة على اجتذاب السائحين. ومن بين هذه القطارات؛ واحد مخصص لـ "الفراولة" وآخر مُكرس لـ "البرقوق"، وهما نوعان من الفواكه تشتهر بهما محافظة واكاياما.
وفي عام 2009، صمم ميتوكا كذلك مبنى جديدا لمحطة كيسي على شكل رأس قطة، تنبثق من سطحه أذنان صغيرتان. وبينما صُمم المدخل على شكل فم، توجد في السقف المائل للمبنى نافذتان بيضاويتا الشكل تمثلان العينين. وتتوهج النافذتان بلون أصفر، عندما تُضاء الأنوار خلال فترة المساء.
وبرأي مسؤولي الشركة "تنبض المحطة بالحياة كقطة، عندما يلتمع الضوء في العينين. يقولون إن القطط تطرد الشر والنحس وسوء الطالع، وربما تفعل هذه المحطة ذلك بالفعل".

Tuesday, May 14, 2019

विदेशी मीडिया में कैसे बदलती है मोदी की हवा

पांच साल पहले भारत में ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनने के बाद कई बार ऐसे मौक़े आए जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी पर कवर-स्टोरी करके अलग-अलग तरह से उनके कार्यकाल और कार्यशैली पर टीका-टिप्पणी की.
इस सिलसिले में ताज़ा कड़ी अमरीका की टाइम मैगज़ीन है जिसने लिखा है, ''क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार को आने वाले और पांच साल बर्दाश्त कर सकता है?"
अमरीकी पत्रिका ने ये सवाल अपने उस अंक के कवर पेज के साथ ट्वीट किया है जो भारतीय बाज़ार में 20 मई 2019 को जारी किया जाएगा.
टाइम मैगज़ीन की वेबसाइट पर प्रकाशित स्टोरी के कवर पेज पर मोदी को 'India's Divider In Chief' बताया गया है, जिस पर काफी विवाद हुआ है.
ध्यान देने वाली बात ये है कि चार साल पहले 2015 में मई के अंक में भी TIME मैगज़ीन ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी पर कवर स्टोरी की थी और तब उसका शीर्षक था- " ".
इसी तरह फोर्ब्स पत्रिका में 16 मार्च 2019 को छपे एक लेख में लिखा है कि ''मोदी ने देश-विदेश में भारत को ऊपर उठाया है, लेकिन शासन करने की अपनी शैली की वजह से उन्हें अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ सकता है.''
लेख में कई अन्य बातों के साथ ये भी लिखा गया है कि ''मोदी की नीतियां आम लोगों तक पहुंचने में विफल हुईं, यहां तक कि औसत भारतीय की मोदी के दौर में हालत ख़राब हुई है.''
साल 2019 में पीएम मोदी की आलोचना से दो वर्ष पहले 18 नवंबर 2017 के एक लेख में फोर्ब्स ने लिखा था- Modi's India Is Rising जिसका मतलब हुआ मोदी का भारत आगे बढ़ रहा है.
इसमें कहा गया था, ''प्रधानमंत्री मोदी विश्व आर्थिक मंच पर भारत को आगे बढ़ा रहे हैं, भारत की रैंकिंग बेहतर हो रही है, मोदी ने संरचनात्मक सुधार किए हैं.''
लेकिन द इकोनॉमिस्ट ने अपनी रिपोर्ट में यहां तक कह दिया कि मोदी ने मौक़ा गंवा दिया है. इस रिपोर्ट में बताया गया कि मोदी ने ऐसा कोई आर्थिक सुधार नहीं किया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. इसमें भारतीय प्रधानमंत्री को एक सुधारक की तुलना में एक प्रशासक ज़्यादा बताया गया.
इसी तरह वॉशिंगटन पोस्ट ने इसी साल जनवरी में छापा कि ''मोदी भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने में नाकाम हुए हैं. मोदी भारतीय अर्थव्यवस्था को 7 प्रतिशत ग्रोथ रेट से आगे नहीं ले जा पाए और नोटबंदी से वो लक्ष्य हासिल नहीं हुए जिसके लिए ये कदम उठाया गया था.''
भारतीय बनाम विदेशी मीडिया
कुछ जानकारों का मानना है कि विदेशी मीडिया तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और भारतीय अंग्रेज़ी मीडिया से प्रभावित होकर अपनी बात कहता है.
फॉरेन कोरेस्पोंडेंट क्लब (एफसीसी) के प्रेसीडेंट और वरिष्ठ पत्रकार एस. वेंकट नारायण कहते हैं, ''बात ये है कि विदेशी मीडिया और उसके संवाददाता अपनी जानकारी के लिए बहुत हद तक उन अंग्रेज़ी अख़बारों पर निर्भर हैं जो दिल्ली से छपते हैं. उनमें से कुछ ही होंगे जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में जाकर ज़मीनी जानकारी जुटाते हैं, बाक़ी अधिकतर संवाददाता भारत के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग से प्रभावित होते हैं जिन्हें अंग्रेज़ी मीडिया में जगह मिलती है. ऐसा इंदिरा गांधी के मामले में भी होता था.''
वरिष्ठ पत्रकार एस. वेंकट नारायण का मानना है कि सिर्फ़ हेडलाइन के आधार पर किसी तरह की पुख़्ता धारणा नहीं बनाना चाहिए. टाइम मैगज़ीन के चर्चित ताज़ा अंक का हवाला देते हुए वो कहते हैं, ''हेडलाइन से आगे बढ़कर कवर स्टोरी को पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि उसमें ये भी कहा गया है कि कांग्रेस पूरी तरह से बेकार है और बस इतना कर पाई है कि राहुल गांधी की मदद के लिए बहन प्रियंका को लेकर आए. लिखा तो ये भी है कि विपक्ष इतना कमज़ोर है कि मोदी का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे.''
'मोदी का कंट्रोल नहीं'
वरिष्ठ पत्रकार हरतोष बल का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया, भारतीय मीडिया से इस तरह अलग है कि वहां मोदी का कंट्रोल नहीं है.
हरतोष बल कहते हैं, ''हमें ये ग़लतफ़हमी होती है कि विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया के बीच बहुत बड़ा डिस-कनेक्ट है. लेकिन ऐसी बात नहीं है. आजकल एक बड़ा बदलाव आ रहा है. आप देखिए विदेशी मीडिया में जो ऑपिनियन पीस आ रहे हैं, वो ज्यादातर भारतीय या भारतीय मूल के लोग ही लिख रहे हैं, जो इंडियन मीडिया में काम कर रहे हैं या इंडियन मीडिया से जुड़े हुए हैं. इसलिए विदेशी मीडिया में जो आप देख रहे हैं, वो इंडियन मीडिया को भी रिफ्लेक्ट करता है.''
हरतोष बल एक और बात की ओर ध्यान दिलाते हैं, वो है मीडिया पर कंट्रोल का होना या ना होना. वो कहते हैं, ''बाहर के मीडिया पर मोदी का कंट्रोल नहीं है. इसी का असर आप विदेशी मीडिया में देख रहे हैं. कुछ लोग हैं जो सही मायने में आलोचनात्मक विश्लेषण कर रहे हैं जो ज़मीनी हक़ीक़त और ठोस तथ्यों पर आधारित हैं.''
हरतोष बल के इस तर्क की एक बानगी 11 मई के वॉशिंगटन पोस्ट में नज़र आती है, जिसमें बरखा दत्त लिखती हैं, ''ये चुनाव पूरी तरह से मोदी के बारे में है, मोदी को दोबारा चुने जाने से भारत का भविष्य तय होगा.''
लेकिन हरतोष बल और एस. वेंकट नारायण दोनों का मानना है कि विदेशी मीडिया में इस तरह के लेख आने से पीएम मोदी को ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता. उनका मानना है कि विश्व का कोई नेता या राजनयिक किसी मैगज़ीन से अपनी राय कायम नहीं करते.
चुनाव की टाइमिंग

Friday, April 5, 2019

وفي مناسبات أخرى انتقدت الفساد والسياسيين الفاسدين

كانت لحظة الإفراج عنها لحظة تاريخية، وقبلت المحكمة فكرة أن السيدات ضحايا سوء المعاملة ربما يكون رد فعلهن "بطيئا" وليس فوريا.
وأرسلت بالفعل رسالة تقول إن المرأة التي تقدم على القتل، تفعل ذلك نتيجة عنف منزلي سافر ولا ينبغي اعتبارها قاتلة بدم بارد.
وتقول برانغا : "نستطيع تغيير الاتجاهات الفكرية في مجتمعاتنا، كان الناس يعانقون كيرانجيت ويرونها بطلة، بدلا من كونها عدوانية ينبذونها".
وأضافت : "كانت تلك لحظة مهمة في تاريخ كفاح المرأة ضد العنف في هذا البلد، خاصة فيما يتعلق بنساء الأقليات، لأنها المرة الأولى التي حدث فيها تفكير وتقبل وإقرار بوجود عنف قائم على أساس الجنس، وأن بعض الطرق التي نعامل بها المرأة مسؤولة إلى حد ما".
وتبقى دعوى استئناف كيرانجيت أبرز قضية لدى منظمة "ساوثهول بلاك سيسرتز" منذ تأسيسها قبل 40 عاما.
وبينما تحتفل المنظمة بعيدها السنوي، عرضت فيلما تناول القضية باسم "مستفزة"، خلال عطلة نهاية الأسبوع ضمن فعاليات مهرجان السينما الآسيوية في بريطانيا الذي يستمر حتى مايو/أيار المقبل.
وتقول برانغا إن قضية العنف ضد المرأة داخل الجاليات لم تسجل تراجعا، بل تتزايد.
وتضيف : "سواء كانت هذه الزيادة بسبب وجود عدد أكبر من الأشخاص الذين يبلغون عن تجربة العنف أو إذا كان السبب هو الزيادة، فهو سؤال صعب الإجابة".
في ذات الوقت تقول كيرانجيت، التي لاتزال تعيش في إنجلترا، إنها فخورة بالطريقة التي أعادت بها بناء حياتها بعد ثلاثين عاما.
وتقول : "أعمل بجد، لدي وظيفة، وتخرج الأبناء في الجامعة وأصبحت جدة. ثلاثون عاما أشبه بكابوس".
تظهر لقطات سجلتها كاميرات المراقبة سيارة بيضاء تدخل أحد أزقة بغداد ببطء؛ يهرع رجل يرتدي ملابس بيضاء نحو مقعد السائق، ويتوقف برهة، ثم يركض باتجاه دراجة نارية يقودها رجل ثان.
تتابع السيارة البيضاء تحركها ببطء في الزقاق.
داخل السيارة تارة فارس، أكثر نجمات وسائل التواصل الاجتماعية العراقية إثارة للجدل، تصارع الموت بعد إطلاق النار عليها.
عادت "عيوش" إلى مدينتها بغداد صباح يوم 27 سبتمبر/أيلول، بعد رحلة قصيرة إلى تركيا، وقرابة الثالثة بعد ظهر ذاك اليوم، وبينما كانت تهم بتشغيل سيارتها، تلقت مكالمة من رقم محمول لا تعرفه. "هاللو عيوش، الحمد لله على السلامة، أنا تارة، شلون كانت سفرتك؟ نلتقي اليوم؟".
لم تبرح تفاصيل تلك المكالمة ذاكرة عيوش أبدا.
ذاع صيت عيوش في العراق لأنها من أوائل الشابات اللاتي عملن "دي جي"، وكانت تمزج الموسيقى الغربية بالأغاني المحلية، كما تعمل في مجال تنسيق الحفلات. أما سبب شهرة تارة فارس فمختلف؛ إذ حصلت على نحو 2.7 مليون متابع لها على موقع انستغرام الذي تستعرض عليه أزياءها المتنوعة، والوشوم التي تنقشها على جسدها، فضلا عن أساليب التجميل المحتلفة التي تبنتها، وكثيرا ما نشرت فيديوهات قصيرة عن أسفارها وصور صفحات من كتب قرأتها، فضلا عن مواقف طريفة مرت بها.
خالطت عيوش وتارة نفس الأوساط حتى غدتا أكثر من مجرد معارف، لكن دون أن تصل علاقتهما للصداقة الوطيدة، وكان من المقرر أن تلتقيا في ذلك اليوم بحي المنصور ببغداد حيث يوجد مكتب عيوش، للاتفاق على تفاصيل حفل ترويجي لنوع من العدسات اللاصقة.
وبعد ساعتين من اتصال تارة، عاودت عيوش الاتصال بها للاتفاق على مكان اللقاء، ولكن، لم يجبها أحد.
حاولت الاتصال بها مجددا في نحو الخامسة والنصف مساء، وإذ بشاب يرد صارخا: "تارة فارس أطلقت عليها النار. تارة فارس أطلقت عليها النار".
لا شعوريا، فتحت عيوش حسابها على فيسبوك ووجدت منشورا تلو الآخر يتحدث عن مقتل تارة، ورأت صورة انستغرام حديثة لتارة وهي ترتدي فستان جينز يكشف أحد كتفيها على خلفية وردية نشرها كثيرون.
تقول عيوش، 37 عاما، واسمها الحقيقي عائشة قصي: "صدمت. انقلبت الدنيا. أصابني خوف وتوجهت فورا للبيت". وصلت أخبار مقتل تارة لأسرة عيوش التي خافت أن تلقى ابنتهم ذات المصير لأنها معروفة أيضا في البلد.
وسرعان ما انتشر الخبر.
كان الإعلامي ساري حسام، 22 عاما، برفقة أصدقائه بمقهى هادئ يلعبون الورق كعادة كثير من الشباب العراقي يوم الخميس، وصدم أيضا لخبر مقتلها خاصة وأنه كان قد أجرى مقابلة مصورة مع تارة قبل أشهر، وتحديدا في أبريل/نيسان 2018.
انتشر الخبر كالنار في الهشيم على وسائل التواصل الاجتماعي، وفي لحظة أصبح مقتل تارة حديث الجميع في ذاك المقهى. لم يصدق ساري الخبر فحاول الاتصال برقم هاتفها المحمول ليسمع رسالتها المسجلة، وكانت مقطعا من أغنية "ووكينغ أون ووتر" للمغني إمينيم.
أما مجد، وقد آثر عدم الكشف عن اسمه الحقيقي، وهو أحد المصورين الذين التقطوا صورا لتارة، فاعتقد بداية أن الأمر لا يعدو أنه فرقعة دعائية؛ كمحاولة جريئة من تارة لجذب مزيد من الانتباه إليها.ما إن انتشر خبر مقتل تارة فارس حتى تحولت وسائل التواصل الاجتماعي في العراق إلى ساحة حرب؛ فقد كان موتها مثار جدل كما كانت حياتها. ولم يكد جسدها يوارى الثرى إلا وانتشرت تعليقات هجومية ونعتها البعض بـ"العاهرة". ولكن كان هناك أيضا من دافع عنها بشدة، فمثلا كتب أحد مستخدمي فيسبوك: "ربما كانت متحررة، وربما كانت تمثل ظاهرة شبابية سلبية، ولكن قبل أي شيء هي إنسانة عراقية".
قد لا يعتبر ما كانت تنشره تارة على انستغرام مثار جدل ألبتة في كثير من بقاع العالم؛ كان سينظر إليها على أنها شابة تعكس ذوقها في تنسيق الملابس وأسلوب حياتها. أما في العراق، فوشم الجسد وحده يعد مثار استهجان لدى كثيرين.
بدأت تارة بوشم صغير على أصابع يديها مصورا هلالا وسهما، ثم امتد على شكل زهرة على ذراعها، كما وشمت عبارة أسفل عنقها تقول "ما يهزك ريح"، وكلمة "علي" على كتفها الأيسر، وأظهرت أحدث صور لها وشما لوجه امرأة، ورأس أسد على امتداد معصمها.
ظهرت تارة في أغلب صورها ترتدي ملابس عادية: تي-شيرت بسيط، بنطالا فضفاضا، بنطالا قصيرا (شورت)، أو بنطال جينز، أو قمصانا طويلة، وتغير شعرها باستمرار طولا وقصرا وتغير لونه بين حين وآخر. لكن صورا أخرى، التقطت لها قبل وقت قصير من موتها، ظهرت فيها وهي ترتدي ملابس داخلية سوداء أو "بودي سوت" بلون الجسم أو صدريات أنيقة مع حلي زينت صدرها أو سترة لا ترتدي شيئا تحتها.
كانت تلك الصور كاشفة، وبالنسبة لكثير من العراقيين كان الكشف "أكثر مما يحتمل"، فضلا عن الوشم الذي نال نصيبا كبيرا من الانتقادات.
يقول المصور مجد (وهذا اسم مستعار) عن تارة إنها "كانت مختلفة؛ مختلفة بطريقتها ومختلفة بملابسها. باقي العارضات العراقيات متزمَتات .. أو بالأحرى ليست العارضة كذلك، بل إن أهلها أو مجتمعها هو الذي يجبرها على أن تكون كذلك. فمثلا من الصعب علي جدا إقناع عارضة أن تلبس قميصا يكشف أحد كتفيها".
أما تارة فلم تعبأ بأي شيء، وارتدت ما شاءت من ثياب.
كان محتوى تدويناتها خفيفا، أو حتى "تافها" في نظر البعض، كانت تسرد فيها أنشطتها اليومية من تناول الطعام في غرفتها، والذهاب إلى صالة الألعاب أو المطاعم مع الأصدقاء، فضلا عن السفر والموضة.
وشأنها شأن كثير من شباب وشابات العراق لم تكن تخف آراءها السياسية، بالأخص في بداية ظهورها، حين كانت شهرتها أقل، ولم تكن أبدا ناشطة بل شابة عراقية تعبر عما كان يجول بخاطرها دون تردد.
بدا العراق صيف عام 2015 على صفيح ساخن؛ حيث اندفعت الحشود في الشوارع مطالبين بإصلاحات سياسية، ومحتجين على تكرار انقطاع الكهرباء ونقص الخدمات الأساسية، وعجت ساحة التحرير بالمحتجين الذين أحاطوا بنصب الحرية.
يومها، قتل شاب من بين المحتجين، وعلقت تارة في قائلة: "الشرطة العراقية والجيش العراق أطلقوا النار على المتظاهرين (..) ليش هالشي؟ هذه أول مرة نشوف الكل متكاتفين بمكان واحد.. سني وشيعي وكردي كلهم ينشدون النشيد الوطني العراقي (..) يعني حلوة؟ شاب بعمر الورد يروح شهيد"

Thursday, January 17, 2019

شاهد.. الصور الأولى للصيادين المصريين بعد إنقاذهم في غزة

نشرت اللجنة الدولية للصليب الأحمر "ICRC"، على موقعها على "تويتر"، صورا للطفل السوري باسل، بينت معاناته في عشر سنوات من الأزمة.
وأشارت اللجنة الدولية، إلى أن الطفل السوري فقد بيته في محافظة حلب السورية مع بداية الأزمة بسبب المعارك، وعندما عاد بعد عشر سنوات فقد يده اليم
وأشارت اللجنة، إلى أن تأثير "تحدي العشر سنوات"، بدا واضحا على الطفولة في سوريا.
واجتاح تحدي الـ10 سنوات، مواقع التواصل الاجتماعي خلال الأيام الماضية، مستقطبا عددا من المشاهير، الذي يتضمن نشر صورتين الفارق بينهما 10 أعوام مرفقتين بهاشتاغ "10YearChallenge#".
نى وأصيب بجراح في وجهه نتيجة انفجار لغم أثناء لعبه مع أصدقائه في الحي.
بحث المبعوث الخاص للرئيس الروسي إلى الشرق الأوسط وإفريقيا ميخائيل بوغدانوف مع رئيس المكتب السياسي لحركة حماس إسماعيل هنية، سبل عقد اجتماع مصالحة فلسطينية شاملة في موسكو.
وذكرت الخارجية الروسية أن بوغدانوف جدد التأكيد خلال مكالمة هاتفية مع هنية على موقف روسيا "الثابت والمتمسك ببعث الوحدة الوطنية الفلسطينية في أقرب وقت ممكن، وإيجاد حل للقضية الفلسطينية استنادا إلى القانون الدولي".
وأضافت: شدد بوغدانوف على استعداد روسيا للاستمرار في الاتصالات المكثفة مع جميع القوى السياسية الفلسطينية المسؤولة، والعمل على تنظيم انعقاد اجتماع فلسطيني شامل في موسكو.
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هنية يتلقى دعوة رسمية من موسكو لزيارة روسيا
وأشارت الخارجية إلى أن هنية أطلع الجانب الروسي على آخر التطورات في قطاع غزة، وركز على ضرورة تحسين الوضع الاجتماعي والاقتصادي لسكان القطاع، لافتا إلى الجهود المصرية المبذولة في هذا الاتجاه.
وكان من المقرر أن يصل إسماعيل هنية إلى موسكو بزيارة رسمية في الـ15 من يناير الجاري، لكنها تأجلت حتى إشعار آخر، دون الإعلان عن الأسباب.
أعلن الرئيس الفرنسي إيمانويل ماكرون أن قوات بلاده ستبقى في سوريا والعراق خلال العام الجاري لمحاربة تنظيم "داعش".
وقال ماكرون في خطاب ألقاه خلال زيارته للقاعدة العسكرية الواقعة بالقرب من مدينة تولوز اليوم الخميس، إن "الانسحاب المعلن لحليفنا الأمريكي (من سوريا) يجب ألا يحرفنا عن هدفنا الاستراتيجي وهو القضاء على داعش".
وأضاف: "سنبقي انخراطنا عسكريا في بلاد الشام ضمن التحالف الدولي (ضد داعش) خلال العام".
وتطرق الرئيس الفرنسي إلى مقتل 5 عسكريين أمريكيين بتفجير في مدينة منبج بشمال سوريا مؤخرا بالقول إن الواقعة تؤكد عدم انتهاء المعركة ضد "داعش"، وأكد أن الأشهر القليلة المقبلة ستكون حاسمة في محاربة التنظيم.
قالت صحيفة  "لو فيغارو" إن السلطات الفرنسية وضعت ألكسندر بنعلا، الحارس السابق للرئيس الفرنسي إيمانويل ماكرون، رهن الاعتقال، والتحقيق معه جار في سوء استخدامه جوازات سفر دبلوماسية.
وقد فتح مكتب المدعي العام في فرنسا تحقيقا ضد بنعلا في 29 ديسمبر من العام الماضي، في قضية "الاستخدام دون سند قانوني" للوثائق الدبلوماسية و "استغلال الثقة".
وبحسب المحققين، فقد استخدم الموظف السابق في قصر الإليزيه، بعد طرده، هذه الوثائق حوالي 20 مرة.
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النيابة الفرنسية توجه تهما لمساعد ماكرون
وقد طفا اسم بنعلا على السطح في فرنسا عقب فضيحة في صيف عام 2018، حين ضرب متظاهرين منتحلا صفة شرطي، ووثقت هذه العملية في تسجيلات فيديو، وكان حينها "مراقبا" إلى جانب قوى الأمن المنتشرة بمناسبة عيد العمال.
وقد عزل قصر الإليزيه بنعلا بعد أن أخذت قضيته حجما كبيرا في الأوساط السياسية والإعلامية  في البلاد.
أجلت محكمة جنايات المنيا في مصر، محاكمة محمود عزت، نائب مرشد الإخوان المسلمين، و16 آخرين في قضية أعمال عنف ومحاولة قلب نظام الحكم، لجلسة 4 مايو المقبل لاستكمال المرافعات.
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مصر.. حكم ببراءة مرشد الإخوان المسلمين في أحداث مسجد الاستقامة
وقال محاميا الدفاع محمد طوسون، وبكر عيد، إن المحكمة انتهت من سماع أقوال الشهود على مدار يومين، بعد أن اطلعت على الأحراز المرفقة بأوراق القضية وتقرير مباحث الأمن الوطني في القضية المتهم فيها محمود عزت و16 آخرين بينهم 10 متهمين محبوسين على ذمة القضية.
وكانت سلطات الأمن المصرية قد ألقت القبض على المتهمين في 14 فبراير عام 2014 بقرية الشراينة بمركز سمالوط بينهم نائب مرشد جماعة الإخوان السيد محمود عزت و16 آخرين بتهمة تكوين خلية إرهابية تهدف إلى قلب نظام الحكم، ومحاولة تخريب الاقتصاد المصري والتحريض على العنف وإثارة الشغب وحيازة مطبوعات من شأنها إحداث بلبلة لدى الرأي العام.

Thursday, December 27, 2018

محمد الحوسني لـ الشرق: طرح منتج "طاقتك" في الأسواق منتصف 2019

بعد فوزه بالموسم السادس في برنامج نجوم العلوم..
 * ابتكار "طاقتك" نظام كفء لترويض الطاقة الشمسية
* صناعة 3 نماذج أولية من ابتكار "طاقتك" وجار العمل على تطويره
* المخترع يواجه صعوبات للحصول على الأدوات والقطع الإلكترونية
* تصنيع أول نموذج لاختراعي "طاقتك" في النادي العلمي
* حصدت الميدالية الذهبية في معرضي جنيف والكويت الدوليين للاختراعات
محمد الحوسني، مهندس بترول خريج جامعة تكساس اي اند ام، وحاصل على شهادة الماجستير في الاستدامة من جامعة حمد بن خليفة، وطالب دكتوراه في الاستدامة، مخترع ولديه براءة اختراع لنظام كفء لترويض الطاقة الشمسية، يعتمد على استغلال العنصرين الحراري والضوئي من الشمس، لتوفير إنتاجية أكبر للطاقة، والفائز بالمركز الأول في برنامج نجوم العلوم لعام 2014، وحصد الميدالية الذهبية في معرض جنيف الدولي للاختراعات، والميدالية الذهبية في معرض الكويت الدولي للاختراعات، كما يعد رائد أعمال ولديه عدد من المشاريع الناشئة مثل منصة محلات للتجارة الالكترونية، الشرق التقت به للتعرف على أهدافه وطموحاته.
أكد الحوسني على أنه تم صنع 3 نماذج أولية من ابتكاره "طاقتك"، حيث انه يعمل على قدم وساق لطرح المنتج في الاسواق منتصف عام 2019، مشيرا إلى انه تم الانتهاء من البحث النظري، وسيبدأ قريبا مرحلة انتاج النموذج الأولي المطور، حيث تم الانتهاء من النموذج الاولى وجار العمل على تطويره في الوقت الحالي.
* تعاون مع جهات مختلفة
وأشار إلى انه بعد فوزه بالمركز الأول في الموسم السادس من برنامج نجوم العلوم، تم التعاون مع جهات مختلفة في الدولة، مثل النادي العلمي القطري، وذلك لتطوير النموذج الاولي من ابتكاره وتحويله إلى منتج نهائي، ومن ثم العمل على ترخيص براءة لشركات تركية لتصنيع المنتج، لافتا إلى أنه كذلك عمل على إكمال الدراسة في مجال الاستدامة والطاقة المتجددة، والحصول على درجة الماجستير، كما انه بصدد الحصول على درجة الدكتوراه قريبا بإذن الله.
وأوضح أن ابتكاره والذي يطلق عليه اسم "طاقتك"، وهو نظام كفء لترويض الطاقة الشمسية، ويهدف إلى تحسين تكامل التقنيات لجعلها اكثر فعالية في توفير المياه الساخنة والكهرباء، منوها إلى انه من خلال هذا الحل، سيتمكن من إحداث تغيير هائل في صناعة الطاقة الشمسية، الامر الذي يجعل الطاقة الشمسية في متناول يد جميع المستهلكين. وتابع قائلا: يهدف نظام كفء لترويض الطاقة الشمسية إلى تحسين أداء الألواح الشمسية في الأجواء القاسية مثل منطقة الخليج، وذلك باستخدام نظام كهروضوئي مركز (cpv)، ومبردات مياه ومولدات كهربائية حرارية TEG)) مثبتة على المركزات الشمسية.
* آلية عمل الابتكار
قال الحوسني إن طاقتك يسعى لاستغلال الطاقة الشمسية، بتكلفة اقل ومساحة اقل وكفاءة اعلى، حيث يعمل النظام على استغلال العنصرين الشمسيين، الحراري والضوئي في آن واحد للوصول الى ادائه المتفوق، ويوفر النظام طاقة كهربائية بالإضافة الى طاقة حرارية بشكل سائل حراري يمكن استخدامه في توليد المزيد من الكهرباء أو استغلاله لاغراض التدفئة، مؤكدا على أنه قد شارك في المؤتمر العالمي للتغيير المناخي في دولة فرنسا، كما شارك أيضا في المؤتمر الدولي للاختراعات في الكويت عام 2015، وحصد الميدالية الذهبية، كما حصد الميدالية الذهبية أيضا بعد مشاركته في معرض جنيف الدولي للاختراعات، ولديه براءة اختراع عن ابتكاره طاقتك.
*ابتكارات أخرى
أكد الحوسني أنه جار العمل حاليا على اختراعين آخرين، الأول هو حقيبة لتحويل الدراجات الهوائية إلى دراجات تعمل بالطاقة الشمسية، وأما الاختراع الثاني، فهو نظام لتنظيف الخلايا الشمسية بتكلفة اقل، موضحا أن الابتكارين حاليا في طور النموذج الاولي وسيتم الاعلان عن معلومات أكثر عند الوصول لمرحلة الانتاج.
* أبرز التحديات
أشار إلى انه توجد بعد التحديات التي تواجه الشباب من المبتكرين، حيث يتمثل التحدي الاول، وهو عامل الوقت، خاصة وان معظم المخترعين هم موظفون على رأس عملهم، ويعيلون عائلات، والاختراع يحتاج لوقت وجهد كبيرين، الأمر الذي يشكل العائق الرئيسي امام المخترعين، مشيرا إلى أن التحدى الثاني ألا وهي البيئة المحيطة، وقد سلكت قطر مشوارا كبيرا في تطوير البيئة المناسبة للمخترعين، ولكن مازال المخترع يواجه بعض الصعوبات في الحصول على احتياجاته من الادوات والقطع الالكترونية للعمل على ابتكاره، كل هذا بالإضافة إلى قلة الاهتمام الاعلامي بالباحثين والمبتكرين، والمنافسة الكبيرة في السوق من الشركات العالمية والشركات المدعومة، مما يمثل عائقا كبيرا أمام المخترعين.

* نصيحة للشباب
وجه الحوسني بعض النصائح للشباب الذين لديهم أفكار أو طموحات، قد يرغبون في مشاركتها مع المجتمع، قائلا: إن طريق النجاح ليس بالطريق السهل، لذلك يجب العمل الجاد والإصرار ومواجهة التحديات، فكلما تغلبتم على عقبة زادت قوتكم وقوة مشروعكم، موضحا أن النصيحة الثانية هي عدم الخوف من خوض التجارب والفشل، فطريق النجاح يسبقه الكثير من التجارب غير الناجحة، وأخيرا شدد على أهمية البحث عن فريق يشارككم الاهتمامات والمبادئ، ويكمل أي نقص في المهارات لديكم حتى تكونوا فريقا متكاملا لديه الادوات المناسبة لمواجهة أي تحد..
واستطرد قائلا: أشكر النادي العلمي على دعمه لي وللشباب المخترعين، فالنادي حقيقة ساعدنا في توفير الكثير من حاجاتنا كمخترعين، ووفر لنا البيئة الفكرية المناسبة للابتكار والاختراع، أنا شخصيا تم تصنيع أول نموذج لاختراعي طاقتك في النادي العلمي ولم أجد منهم إلا كل الدعم والمساندة، فلهم جزيل الشكر.

Monday, November 26, 2018

ماذا فعلت بيلا حديد أثناء رحلتها البرية الصحراوية في أبوظبي؟

دبي، الإمارات العربية المتحدة ( ) -- على هامش سباقات جائزة أبوظبي الكبرى للفورمولا 1.. حرصت عارضة الأزياء فلسطينية الأصل، بيلا حديد، ألا تغادر دولة الإمارات دون أن تعيش مغامرات برية في الصحراء.
ولم تتواجد بيلا حديد في صحراء أبوظبي وحدها، وإنما كانت برفقة المغني الكندي، "ذا ويكند"، ومجموعة من الأشخاص الآخرين. وبدورها، وثقت حديد رحلتها البرية، والنشاطات التي قاموا بها، مثل الرك
وبعيداً عن وجودها في الإمارات لمتابعة حفل "ذا ويكند"، انتهزت حديد فرصة مقابلة أفراد من عائلتها بمدينة أبوظبي. إذ نشرت صوراً ومقاطع فيديو عبر حسابها الرسمي على موقع "انستغرام"، وكتبت "إنها ليلة مميزة حقاً، لا يُتاح لي فرصة رؤية قريباتي ريما، وسلمى، وآية، إلّا عند سفري إلى مدينة دبي".
وأضافت أنهن "تمكنّ من حضور الحفل في أبوظبي.. أشعر أنني محظوظة للغاية". وبالنسبة إلى حفل "ذا ويكند"، والذي حضرته عارضة الأزياء الفلسطينية، قالت معلقة: "احتفال رائع في واحد من أفضل الأماكن بالعالم".
وكانت هذه الرحلة سبباً في استرجاع حديد لذاكرتها، إذ أوضحت أنها تعرضت لحادث على السيارة ذاتها، في السادسة من عمرها، مما أسفر عن ظهور ندبة على وجهها.
وأثناء وجود حديد في الإمارات، نشرت عبر خاصية "الستوري" على موقع "انستغرام" صورة لقطعة أثاث، كانت قد تزينت بعين الحسد، أو العين الزرقاء، وكتبت "تُذكرني هذه بجدتي".
قد يساعد كتاب جديد نشرته سلسلة فنادق "مستر أند ميسز سميث"، على استعادة بريق الحب الضائع. كتاب "غرف النوم الأكثر إثارة في العالم"، نُشر مؤخراً بمناسبة الذكرى الـ15 لتأسيس سلسلة الفنادق.
دبي، الإمارات العربية المتحدة ( ) --يجب على غرف النوم المغرية أن تشرك جميع الحواس.. هذا ما يعتقده جيمس وتمارا لوهان مؤسسا علامة الفنادق التجارية، "مستر أند ميسز سميث".
بالنسبة لغالبيتنا، قد نواجه نقصاً في الرومانسية في حياتنا اليومية. بين ض
دبي، الإمارات العربية المتحدة ( ) -- لطالما حرصت مدينة دبي على تشجيع مواطنيها بالاشتراك في العديد من التحديات البدنية المتنوعة، ولتبرهن أنه ليس هناك من مستحيل، شاركت نساء شرطة دبي في تحدي فريد من نوعه، إذ كسرن بذلك الرقم القياسي في موسوعة "غينيس".
وأوضحت موسوعة "غينيس" للأرقام القياسية، أن القواعد الإرشادية تنص على مشاركة مائة شخص كحد أقصى، ولكن، شرطة دبي اعتمدت على 77 امرأة فقط. وبدورهن، تمكنت نساء شرطة دبي من سحب طائرة تزن أكثر من 240 طناً، لمسافة تزيد عن المائة متر.  
وضمن مشاركة الشرطة في تحدي دبي للياقة، نجحت 77 امرأة في شرطة دبي بسحب طائرة تابعة لطيران الإمارات، من طراز بوينغ " - ".
غوط العمل، ورحلات المدارس، وانشغالنا بهواتفنا، غالباً ما يكون من الصعب العثور بعض الوقت الخاص لقضائه مع شركائنا على انفراد.
ولكن، قد يساعد كتاب جديد نشرته سلسلة فنادق "مستر أند ميسز سميث"، على استعادة بريق الحب الضائع هذا. ونُشر كتاب "غرف النوم الأكثر إثارة في العالم"، مؤخراً بمناسبة الذكرى الـ15 لتأسيس سلسلة الفنادق.
ويضم الكتاب 35 جناحاً فندقياً جذاباً من جميع أنحاء العالم، من أجنحة ريفية في وسط الصحراء، إلى أخرى عصرية وسط ناطحات سحاب شاهقة، ومدن مزدحمة. ولكن، جميع الغرف المدرجة في الكتاب، تشترك بميزة واحدة، "فجميعها تتمتع برومانسية مختلفة"، بحسب شرح الكتاب.
تعرّفوا إلى بعض أكثر غرف العالم إثارة، في معرض الصور أعلاه
وب على الإبل، وتزلج صديقها على رمال الصحراء.
وأوضح اللواء عبد الله خليفة المري بحسب ما ذكر حساب شرطة دبي الرسمي عبر موقع "فيسبوك" أن "تحدي دبي للياقة ساهم في رفع ثقافة الرياضة وعدد الممارسين في مجتمع دولة الإمارات، مما خلق أنشطة رياضية ممتعة بأساليب مبتكرة، في مواقع كانت تشهد كل يوم تحدياً جديداً".
وأضاف المري أن دخول موسوعة "غينيس" للأرقام القياسية يعد إنجازاً جديداً، كان قد أُضيف إلى قائمة الإنجازات المتعددة لشرطة دبي على مستوى العالم.
ويُشار، إلى أن تحدي دبي للياقة هو بمثابة خطوة في مسيرة دبي نحو التحول إلى المدينة الأكثر نشاطاً على مستوى العالم. ويُذكر، أنه أُطلق في نسخته الثانية، بين 26 أكتوبر/ تشرين الأول و24 نوفمبر/ تشرين الثاني، برعاية الشيخ حمدان بن محمد بن راشد آل مكتوم، ولي عهد دبي، رئيس المجلس التنفيذي لإمارة دبي